काश....part 1
Part
- 1
काश.....
(यह एक
सच्चे घटना पर आधारित कहानी है तथा निम्नलिखित पात्रों के नाम और स्थान काल्पनिक
है ।)
“ हेल्लो, सुजाता
कैसी है तू ?”
“ मैं ठीक हूं,
अपना बता, आज कॉलेज नहीं गई ?”
“नहीं यार, तुझे
पता है आज भइया देवेश के घर गये हैं रिश्ते की बात करने ।”
“क्या बात है, आज
तो मैडम के पैर धरती पर नहीं है शायद...”(
आज इन्द्रधनुष के सातों रंग दिया के मन के आँगन में उतर गये हैं, बिन बादल बरसात
उसके हृदय भूमि में बरस रही है, उसका मन मोर बन झूम-झूम कर नाँचना रहा है । बेपरवा
उसके बालों का उड़ना, उसके कदमों का थिरकना, उसके सांसो की रफ्तार उसके हृदय का
हाल बयां कर रही है । अपने मन की उथल-पुथल को काबू में रख कर वह अपने प्रिय सखी
सुजाता को कॉल करती है । )
“सच में यार,
वर्षों से सजाए सपने को आज एक मूर्त रूप मिलने जा रहा है ।”
“ हाँ दिया, मैं
तेरे लिए बहुत खुश हूं, बस बिहार जाके असम वालों को भूल मत जाना
”
“ अरे नहीं यार, तू
भी न....”
“ अच्छा तेरे कॉलेज
का क्या होगा ?”
“ मैंने प्रिंसिपल
सर को कह दिया है कि अगले सेसन के लिए नये अध्यापक को चुन ले...”
सुजाता से बाते कर के दिया
फोन रख कर उस कल्पना लोक में विचरण करने लगती जहाँ देवेश के साथ बिताए प्यार भरे
लम्हें थे ।
छह भाई-बहनों में सबसे छोटी दिया हमेशा से पूरे
घर की लाडली रही है । पिता का सपना था कि उनके संतानों में से किसी को डॉक्टर की
उपाधि मिले परन्तु पारिवारिक उलझनों और परिस्थितिवश बड़े भाई-बहनों को यह मौका
नहीं मिला । केंसर से असमय ही पिता के मृत्यु ने घर की सारी बागडोर बड़े भाई विजय
के हाथों में सौंप दिया । बड़ी दोनों बहनों की शादी, छोटे भाइयों की पढ़ाई, दिया की
शादी, हृदय रोग से ग्रसित माँ की देखभाल आदि उलझलों के बाद भी घरवालों ने कभी दिया
को किसी चीज की कमी नहीं होने दिया । धीरे-धीरे छोटे दोनों भाई अजय और विकास भी
विजय के साथ व्यापार में जुड़ गये । घर की स्थिति धीरे-धीरे सुधरती चली गई और दिया
ने भी अपने पिता की इच्छानुसार पी-एच.डी की उपाधि हासिल कर पूरे खानदान में ही
नहीं बल्कि पूरे गाँव में अपने पिता का नाम रोशन किया ।
वह कहते है न ‘एक का समाधान दूसरे की समस्या
बन जाती है ।’
कुछ ऐसा ही चौहान परिवार के साथ होने लगा । दिया के लिए योग्य वर की तलाश एक
समस्या बन गई । पृथ्वी पर कोई समस्या ऐसी नहीं है जिसका कोई समाधान न हो, समस्या
के बारे में सोचने से बहाने मिलते है और समाधान के बारे में सोचने पर रास्ते मिलते
है, यही सोच दिया ने स्वयं ही इस समस्या का समाधान खोजने के लिए “शादी डोट कोम” का सहारा लिया । जहाँ उसकी
मुलकात देवेश से हुई । बंगाल, नेपाल, झारखंड का मित्र बिहार प्रदेश के कोसी नदी के
तट पर स्थित कटिहार के एक युवक का जादू ऐसा चला कि आसाम के करिमगंज की दिया अपना
दिल ही हार गई । और एक दूसरे से मिलने के बाद इनका प्यार दिन-ब-दिन इतना गहरा होता
गया कि दोनों ने शादी के बंधन में बंधने का फैसला कर लिया । राजा-महाराजों के गढ़
राजस्थान से आकर बिहार में बसे इस अग्रवाल परिवार के सोच-विचार काफी हद तक मौलिक
और आधुनिक थी । देवेश, दिया के पूरे परिवार वालों से बात करने लगा और दिया भी
देवेश के मम्मी-पाप से बात करते लगी । अपने परिवार से बात कर देवेश ने दिया के
घरवालों को अपने घर बुलाया ।
अपने
कल्पना लोक में खोई दिया का ध्यान तब टूटा जब उसके फोन की रिंग बजी ।
“हेल्लो”
“हेल्लो, मैडम – मैं
बी. बी. पब्लिक हाई स्कूल, कोलकाला से बोल रहा हूं ।”
“ जी
सर, बोलिए ”
“ मैडम
आपने हमारे स्कूल में प्रिंसिपल के पोस्ट के लिए इंटरव्यूह दिया था, तो बोर्ड
मेम्बर ने यह पोस्ट आपको देने का फैसला किया है ।”
“सर अशेष धन्यवाद
आपका, जो आपने मुझे इस काबिल समझा परन्तु मुझे बहुत ही दुःख के साथ कहना पर रहा है
कि अपने कुछ व्यक्तिगत कारणों से अब मैं इस पद को नहीं सम्हाल पाऊंगी । ”
“मैडम, हमने तो इस
पद के लिए आपकों चुना पर.... फिर भी आपसे विनती है कि एक बार फिर इस विषय पर
सोचिएगा ।”
“धन्यवाद
सर पर यह मेरा अंतिम फैसला है ।” यह
कह कर दिया ने फोन रख दिया
अपनी शादी के लिए दिया अपने सारे कामों को समेट
रही थी । देवेश के घरवालों ने दिया का फोटो देखा था । देवेश का हमेशा से यही कहना
था कि – “
दिया
अगर तुम्हारे परिवार वालों के ओर से कोई दिक्कत नहीं हुई तो हमे कोई अलग नहीं कर
सकता । भगवान ने हमे मिलाया है जिसमें मेरे परिवार की सहमती भी अब शामिल है बस भइया
‘हाँ’
कर
दे....”
देवेश
को इस बात का डर था कि वह बी.कोम था और दिया पी-एच.डी । उसके बातों में हमेशा दिया
जैसी जीवन साथी पाने का गर्व झलकता रहता था । क्योंकि उसके गाँव में इतनी
पढ़ी-लिखी बहू किसी की नहीं थी । अब सब दिया के घरवालों पर निर्भर था ।
देवेश के घर जाने का निश्चय हुआ परन्तु विजय के मन में इस रिश्तों को लेकर
कई सवाल उठ रहे थे । तीनों भाई इस विषय में सलाह-मश्वरा करने लगे ।
“तुम्हें क्या लगता
है अजय, मारवाड़ी परिवार में शादी करना सही होगा ?”
“भइया,
लड़का भले ही कम पढ़ा-लिखा है पर उसके बातों से तो काफी समझदार और आधुनिक लगता है,
एक दो बार मुझसे भी बात हुई है । कटिहार के गिने-चुने व्यवसायिकों में उनकी गिनती
होती है । मैंने इंटरनेट में देखा है । ऑनलाइन भी उनका व्यपार चलता है । एक बार
वहाँ जाने से सारी बाते साफ हो जायेगी ।” विजय
के मन की दुविधा को दूर करते हुए अजय बोला ।
“ आदमी
की व्यवहार और मेहनत ही उसकी पहचान है भइया । अगर इंसान सही हो, कमाता हो तो वह
कितना पढ़ा-लिखा है यह सवाल अधिक मायने नहीं रखता । और अंगूठाछाप तो नहीं है न ! ” अपना
नजरिया रखते हुए विकास ने कहा ।
तभी जो अब तब तीनो बेटों की बाते सुन रही थी बेड
से उठते हुए माँ ने कहा
“
अंजाने
लोग, अंजानी जगह, बिल्कुल नई संस्कृति में बस पाना इतना आसान नहीं होता, विकास।”
“माँ
जमाना बदल गया है और हमारी दिया किसी भी परिस्थिति में डगमगाने वाली नहीं है । वह
हर परिस्थिति का सामना डट कर करने की हिम्मत और गुण दोनों रखती है ।” माँ
को समझाते हुए विजय की पत्नी बोली।
गांव
हो या शहर, परम्परा के नाम पर जात-पात का बंधन आज भी हर शहर और गांव में अपनी टेक
जमाए बैठा है । बहन की बारात आये और गांव वाले कोई तमाशा करे इस बात को ध्यान में
रखते हुए विजय ने अपने समुदाय की एक बैठक बुलाई । मारवाड़ी समुदाय में अपनी बहन की
शादी के लिए वह सबसे सहमती मांगता है और सारी बातों से अवगत समुदायवालों ने
खुशी-खुशी अपनी सहमती दे दी क्योंकि दिया ने सबका सर गर्व से उच्चा किया है । साल
भर के सोच-विचार और सारी उलझनों को सुलझा अतंत: विजय
देवेश के घर गया ।
“दिया पता नहीं भइया को यहा आकर
कैसा लगेगा, वह क्या कहेंगे ? ” बैचेन सा देवेश कहता है ।
“तुम बेकार में ही
परेशान हो रहे हो, सारी बातें तो फोन में हो चुकी बस एक बार भइया पापाजी-मम्मीजा
से मिल ले फिर सब ठीक...
आज तक तुम्ही मुझे समझाते रहे और आज खुद ही घबरा
रहे हो ...?” देवेश
पर अपने विश्वास को ओर भी दृढ़ करते हुए दिया बोली....। क्योंकि देवेश के मन में
उसे खोना का जो डर था उसे दिया अच्छे से जानती है ।
देवेश के घर विजय की बहुत
आवाभगत की गई । घर, वर, परिवार, गांव, माहौल, व्यपार आदि सब कुछ ही विजय को बहुत
अच्छा लगा । उन्होंने बड़े ही प्यार और सम्मान के साथ विजय को दो दिन बाद विदा किया
। विजय भी अपनी सहमती देकर उन्हें अपने घर आमंत्रित करता है ताकि शादी की
प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके ।
ट्रेन के डब्बे में
बाकी यात्री अपने साथ बैठे जाने-अनजाने यात्रियों से बात कर रहे है, कोई सोया है
तो कोई मुबाइल में व्यस्त है परन्तु वियज एक अप्रत्यक्षित विजय के गर्व में गर्वित
हो रहा है । एक पिता की तरह अपने बहन को पढ़ा-लिखा कर, अपने पैरों में खरा कर , एक
सुयोग्य वर और सुसम्पन्न परिवार में देने की खुशी दीप की तरह प्रज्वलित उसके चेहरे
पर साफ दिख रही थी । देवेश से मिलने से पहले अनेकों सवाल उसके मन को झकझोर रहे थे
पर देवेश जैसा सरल-सहृदय व्यक्ति से मिल कर उसकी सारी चिन्ताए दूर हो गई । किस तरह
बारातियों का स्वागत किया जाये, लड़के को क्या-क्या दिया जाए, घर-मंडप-जनवासे को
किस तरह सजाया जाए, दिया के लिए शादी का जोड़ा कैसा हो, खाने के लिए मारवाड़ी
रसोइयों को ही लाया जाए आदि योजनाएं बनाते हुए विजय की आँख कब लग गई उसे पता ही
नहीं चला ।
दिया के अरमानों को जैसे
पंख लग गये हो क्योंकि देवेश ने उसे विजय के घर पहुंचने से पहले ही बता दिया था कि
भइया ने उन्हें आमंत्रित किया है ।
दूसरे ही दिन विजय घर पहुंच गया । उसके चेहरे के
आभा को देख घरवाले समझ गये कि सब कुछ ठीक है
। नहा-धोकर खाना खाते हुए ही विजय बोला - “माँ घर-वर-परिवार सब कुछ बहुत
बढ़ीया है । सच में बहुत अच्छा भाग्य है हमारे दिया का जो ऐसा घर-परिवार मिला है ।
देवेश बाबू से मिलकर मन को तसल्ली हुई कि हमारे दिया का वह बहुत ख्याल रखेंगे । ”
“हर माँ-बाप की यही
इच्छा होती है कि उसके बच्चें सुख से रहे । एक बार मैं भी उनके परिवार वालों से
मिल लेती तो तसल्ली हो जाती बेटा ।” माँ
के इस वाक्य में एक ओर बेटी को अच्छे घर-वर मिलने की शांति थी तो दूसरी ओर एक
अप्रत्क्षीत चिन्ता भी....।
“पर
दान-दहेज की बात कुछ किये की नहीं, ?” विजय
की पत्नी बोली
“नहीं
प्रभा, उन्होंने तो इस बारे में कुछ कहा ही नहीं , और वैसे भी देवेश बाबू पहले ही
दिन मुझसे बोले थे – भइया, दिया पढ़ी-लिखी और सरल-सहज गुण वाली है हमारे लिए यही
काफी है । बाकी कोई भी बात हमारे लिए उतना मायने नहीं रखता । ”
“फिर भी बेटा, एक
बार उसके माता-पिता का मन तो टटोल लेना चाहिए था ।”
“तुम भी न माँ....”
“हम क्या अपनी बहन
को ऐसे ही विदा करेंगे ! पूरे
करिमगंज वाले दिया की शादी को याद रखेंगे ऐसी धूमधाम से उसको विदा करेंगे । आज तक
की जितनी जमा पूंजी है सब लुटा दूंगा पर उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आने दूंगा ।”
अब सब को
उनके आने का इंतेजार था । दो दिन हो गये पर देवेश का कोई कॉल नहीं आया, दिया ने कई
बार कॉल किया पर उसका कोई जवाब नहीं आया । काम में व्यस्त रहने के कारण पहले भी कई
बार ऐसा होता था पर जैसे ही उसे फुर्सत मिलती वह कॉल करता । कहीं देवेश को कुछ हुआ
तो नहीं इस फिक्र में दिया देर रात तक देवेश को फोन मिलाती रही और अंतत:
उसने
फोन उठाया ।
“हेल्लो,
कहा हो तुम, तुम ठीक तो हो, घर पर सब ठीक तो है
?”
“........”
“अब
कुछ बोलोंगे भी या ऐसा ही मुझे परेशान करते रहोंगे ।”
“मैं ठीक हूँ और घर
पर भी सब ठीक है ।”
“ ओह,
तो तुम मुझे सता रहे हो....जितना सताना है सतालो जनाब, कुछ दिनों बाद मैं खुद
तुम्हारी खबर लूंगी ।”
“.......”
“हेल्लो .....कोई
मुझे सुन रहा है ?”
“दिया मेरे घर
वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं । अब हमारे लिए यही अच्छा होगा कि हम बात न करे...।”
(आगे....... आपके प्रतिक्रिया के बाद)
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