काश - part - 2
Part --
2
काश.....
“तुम मजाक
कर कर रहे हो, है न ? मुझे पता है तुम मजाक कर रहे हो लेकिन ऐसा मजाक मुझे बिल्कुल पसंद नहीं, देवेश ।”
“काश यह मजाक होता दिया ।”
“.........”
“हेल्लो, दिय, दिया.....”
“तुम्हें पता भी है कि तुम क्या कह रहे हो ? कल तक तो सब ठीक था आज अचानक से क्या हो गया ? क्या बात है मुझे खुल के बताव , बिना कुछ सोचे समझे एक ही पल में सब कुछ खत्म कर देने
को कहना तुम्हारे ही कितना आसान है न ! मुझे तो विश्वस ही नहीं हो रहा कि तुम ऐसा कह रहे हो ।” दिया को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था , रोये या गुस्सा करे । बस जो मुह से निकलता गया वह
बोलती चली गई । एक ही पल में उसके कल्पनाओं का पक्षी इस तरह
घरती पर गिरा कि....
अब तक सब कुछ ठीक था तो अचानक से क्या हुआ यही सवाल वह बार-बार करती रही
। रूधे गले से देवेश को समझाने लगी कि जल्दबाजी में कोई भी फैसला लेना सही नहीं । “तुम कुछ
भी करो पर मुझे खुद से अलग मत करो । कभी भी किसी बात के लिए जिद नहीं करूंगी, तुम जैसा चाहोंगे मैं वैसे
ही रहुंगी लेकिन इस रिश्तों को तोड़ने की बात मत करो ।” दिया के
बार-बार समझाने के बाद वह फिर अपने घरवाले से बात करने को इस शर्त पर राजी हुआ कि – उसे एक महीने का समय चाहिए तब तक दिया आगे से उसे कॉल या मेसेज न करे । अंधेरी रातों में तारों का प्रकाश
भी चन्द्रमा के प्रकाश से कम नहीं होता । दिया अपने प्रेम और एक दूसरे के साथ बिताए पलों पर विश्वास कर देवेश के शर्त को मान गई ।
बचपन में हम रो के सो जाते थे लेकिन बड़े होने पर रोने के
लिए सोने का बहाना ढूढ़ते है । दिया की दशा भी इसी प्रकार की हो गई । अपने घर
परिवार को मना कर, इतन दूर , अनजाने संस्कृति और
माहौल में जाने का फैसला उसके स्वयं का था । जहाँ लोग उसके
दिए सुझाओं और निर्देशो को बहुत ही सम्मान के साथ ग्रहण करते हैं वहीं
आज उसके स्वयं के किए फैसले का ऐसा परिणाम देख उसे स्वयं पर ही
विश्वास नहीं हो रहा था । परन्तु उसे देवेश पर पूरा विश्वास था कि वह सब ठीक कर देगा ।
विजय को लौटे हुए 10 दिन हो गये परन्तु देवेश के ओर से कोई खबर नहीं आते देख
उसने स्वयं देवेश को कॉल किया ताकि उसके आने की तारीख
पता चल सके । जिससे उनके स्वागत की तैयारी वह अच्छे से कर सके । लेकिन देवेश ने फोन नहीं उठाया । उसके इस
व्यवहार ने उसके विश्वास के दर्पण में जाने-अनजाने एक
लकीर खींच दी । दिया भी अब कुछ खोई-खोई सी रहने लगी ।
मुश्किल से दिन में एक-दो बार ही उसकी आवाज सुनाई देती ।
दिन के आधे से ज्यादा समय मंदिर में भी उसका बितने लगा और
बाकी का समय अपने कमरे में । देवेश ही अब उसका एकमात्र सहारा था । दिया के लिए एक-एक दिन काटना मुश्किल होने लगा । 15
दिन बीतते-बीतते उसकी दशा दुर्दशा में बदल गई । देवेश ने विजय के कॉल
का कोई जवाब नहीं दिया और दिया के बिगड़ते हाल ने भी स्पष्ट कर दिया की उन्हें यह
रिश्ता मंजूर नहीं लेकिन कारण क्या है उन्हें
समझ में नहीं आरहा था ।
“दिया, दिया तुम तो मुझे भूल ही गई ।”
ध्यानमग्न सी
दिया के कानों में इस आवाज के जाते ही वह अपने आसुँओं को अपने आखों में ही समेटे
हुए बोली – “अरे, संतोष तुम कब आये ?”
“रहने दो, न किसी मेसेज का जवाब मिलता है और न ही कॉल का
। तेरे भाई से कोई गलती हो गई क्या ?”
“नहीं संतोष गलती तो मुझसे हुई है...”
“मतलब...”
“........”
संतोष, दिया का चचेरा भाई है,
जो कोलकाता में नौकरी करता है । वह दोनों हम
उम्र थे इसलिए देवेश के बारे में उसे पहले से ही सब कुछ पता था । अपनी माँ से दिया के बारे में सुनने के बाद उससे रहा नहीं गया और वह दो दिन की छुट्टी
में घर आ गया ।
दिया ने उसे सारी बातें बताई । बेसुध सी दिया, देवेश के बातों का सही-गलत किसी भी पक्ष पर विचार करने की हाल में नहीं थी । इसने
दिनों से देवेश ने कोई मेसेज या कॉल नहीं किया था । देवेश के इस व्यवहार की वजय उसे भी समझ में नहीं आरहा था । उसने दिया से ही वजह जानने की कोशिश की ।
“दिया आज महीना होने को है, उसकी कोई खबर नहीं और न ही वह कॉल का कोई जवाब दे रहा है और तुम हो कि खुद को
खत्म करने की कगार में खड़ी हो । तुम्हारे इस हालत से क्या वह लौट आयेगा ? अरे, उसे तो पता भी नहीं कि तुम इस हाल में हो ।”
“ नहीं संतोष वह
आयेगा, उसने मुझसे बस कुछ समय मांगा है ।”
“ आखिर समय मांगने की वजह क्या है, पहले से ही सब कुछ तय था फिर अचानक से ऐसा क्या हो गया ?”
“........”
अपनी बात को पूरा करते हुए
संतोष बोला
“कोई
असुविधा है, यही बताने के लिए ही सही विजय भइया से एक बार बात तो कर ही सकता था न, पर नहीं....”
दिया के मन में भाँति-भाँति के संकल्प-विकल्प उठ रहे थे,
कदाचित वह काम
में व्यस्त होगा, जब कॉल देखेगा तो वह अवश्य जवाब देगा । अपने मन को समझाते हुए दिया ने संतोष को भी इस बात का
विश्वास दिलाया । परन्तु संतोष , दिया के इस पागलपन को समझ रहा था । उसने दिया के फोन से
देवेश को कॉल किया तो दिया का नम्बर ब्लौक था । संतोष ने दिया को बिना बताए अपने
मुबाइल से उसे फिर फोन किया पर संतोष ने जैसे ही दिया का नाम लिया देवेश ने फोन रख दिया
। और संतोष के नम्बर को भी उसने ब्लौक कर दिया । दिया इस हालत में नहीं थी कि
संतोष उसे यह बात बता सके । उसने यह बात दिया को नहीं बताया और बहुत ही धैर्य के
साथ दिया को सम्हालने की कोशिश करने लगा ।
“ दिया यह क्या पागलपन है । तुम हमारे खानदान की ही नहीं हमारे समुदाय की भी वह
पहली लड़की हो जिसने ताऊ जी के इच्छा के लिए स्वयं को इस काबिल बनाया । हमे तुम पर
गर्व है कि तुम हमारे घर की बेटी हो । घर पर कोई भी काम होने से बड़े भइया भी एक
बार तुमसे सलाह-मश्वरा जरूर करते है । दूसरों के राह दिखाने वाली आज खुद अंधकार में भटक रही
है । दिल से नहीं दिमाग से काम लो । ”
“ऐसा कुछ नहीं है संतोष, मैं बस उसका इंतजार कर रही हूँ । और दिमाग से किया गया प्यार नहीं होता संतोष ।”
“तुम्हें क्यों समझ में नहीं आ रहा , वह अब नहीं आयेगां । रिश्तें जोड़ने वाले ऐसे फोन देख कर भी अनदेखा नहीं करते ।”
“वह व्यस्त होगा संतोष ”
“..........”
जब पता हो किसी को भूलना
है तो तकलीफ जरूर होती है परन्तु जब समझ में न आये कि याद रखना है या भूल जाना तो
उस पीड़ा को सहना असहय हो जाता है । सच में कोई कितना भी पढ़ा-लिखा और समझदार क्यों न हो मोहब्बत अच्छे-अच्छे को पागल कर ही देती है । दिया के पागलपन
पर संतोष को गुस्सा के वजह तरस आ रहा था । उसने अपने दिल को मजबूत करते हुए कहा – “दिया उससे कहीं
अच्छा लड़का तुझे मिल जायेगा । कोई तुझे अभी शादी करने को भी नहीं कहेगा लेकिन
तुझे इस भ्रम से बाहर निकला होगा ।”
“तुम सब क्यों घबरा रहे हो, मैं कह रही हूं न देवेश ने मुझसे वादा किया है, वह जरूर आयेगा ।”
दिया का दिल और दिमाग इस हालत में नहीं था कि वह कुछ भी समझ
सके । दिया की आँखे जरूर संतोष को देख रही थी पर वह किसी और को तलाश रही थी । उसे कुछ समय अकेला छोड़ना ही सही
रहेगा यही सोच संतोष अपने घर चला गया ।
संतोष के जाते ही दिया अपने मुबाइल से देवेश के फोटो और
उसके दिये मेसेजों को देखने लगी । पिछले एक साल से देवेश को किये सारे मेसेजेस उसके पास थे ।
इस एक महीने के इंतजार में वह मेसेजेस ही उसकी सहचरी बनी रही । वह हर रोज उन मेसेजों को पढ़ती, उन पलों की कल्पनाओं में ही उसका दिन बीतता रहा,
जो उसने देवेश के साथ बिताये थे । पहली बार मिलने पर जब देवेश ने यह कहते हुए उसके माथे को चूमा था कि “ बाबू, तुम से मिलके मुझे विश्वास हो
गया कि तुमसे अच्छी जीवन साथी मुझे मिल ही नहीं सकती ।” अवचेतन सी अपने कल्पना लोक से निकल उसने घड़ी की ओर देखा तो रात के 1 बज रहे थे । उसका मन अधीर हो
गया अपने देवेश से बात करने के लिए । उसने देवेश को कॉल किया, लेकिन उसका नम्बर ब्लॉक था । दिया पर जैसे वज्र गिर गया हो , यह जातते हुए कि ब्लॉक किये गये नम्बर से कॉल नहीं जाता
वह लगातार उसे कॉल करती रही । अंत में दिया के मुबाइव का
चार्ज खत्म हो गया । वह पूरे घर में इधर से उधर चलती रही.....
“एकमात्र
उसके बातो पर विश्वास कर के ही उसके परिवार वाले इस रिश्तें के लिए तैयार हुए,
भइया उतनी दूर देवेश के घर गये, घर-परिवार, समुदाय और रिश्तेदारों को भी इस बात की
खबर थी कि उसकी शादी बिहार के किसी अग्रवाल परिवार में होने वाली है । अब अगर यह
शादी नहीं हुई तो उसके घरवालों की कितनी बेज्जती होगी, सब के सामने भाइयों का सर
झुक जायेगा...ऐसे अनेक बातों का तूफान दिया के मन में उठने लगे । वह बस सुबह होने
के प्रतीक्षा करने लगी ।
सुबह होते ही खुद को और अपने आँसुओं को औरों के नजरों से
छुपाते हुए उसने अपने घर के पास वाले टेलीफोन वुत से देवेश को कॉल किया । देवेश ने बस
हेल्लो कहा, इससे पहले वह कुछ कहता दिया कहने लगी “ देवेश तुम कैसे ऐसा कर सकते हो ? एक बार भी तुमने नहीं सोचा
तुम्हारे इस व्यवहार से मेरा क्या होगा । तुम अच्छी तरह जानते हो मेरे लिए अब
तुम्हरे बिना रहना मुमकिन नहीं और मैं यह भी जानती हूं तुम भी मेंरे बिना नहीं रेह
सकते ।”
“.....”
“क्या बात
है , तुम क्यों घवरा रहे हो । घर के हर असुविधा का सामना हम मिल
कर कर लेंगे ?”
“दिया, दिया ” अपनी ही सुध में दिया बोलती ही जा रही थी
“दिया मेरी बात सुनो - अब मैं जो कहता हूं उसे समझने
की कोशिश करना, मैं भी तुमसे प्यार करता हूं,
लेकिन....”
“लेकिन क्या देवेश, हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं,
अब तो हमारे
घर वाले भी तैयार हैं तो फिर अब यह ‘लेकिन’ क्यों ?”
“मैं
तुम्हें यह सब नहीं कहना चाहता था पर तुम्हें सुनना ही है तो सुनों, तुम लोगों का ‘स्टेटस’ हम से बहुत
नीचे है ।”
इतना सुनते ही दिया एक दम से चुप हो गई और उसके आँखों से
बहते आँसू भी उसके आँखों में ही थम गई । पर देवेश बोलता ही गया....
“ तुम पी-एच.डी की हो और अब पोस्ट डॉक्टोरेट कर रही हो तो मुझे लगा तुम काफी बड़े घर की हो इसलिए मैंने कभी तुम्हारे भइयों के व्यपार के बारे में
ज्यादा कुछ नहीं पूछा पर तुम्हारे भइया से मिल के पता चला की तुम लोगों का बस छोटे-छोटे दुकान है । तुम्हारे भइयों की यह औकात नहीं की वह हमारी शादी में 15-20 लाख खर्च कर सके । अपने ‘स्टेटस’ के किसी लड़के से तुम भी शादी करलो । मेरी शादी तय हो गई है ।” इतना
कहते ही उसने फोन रख दिया । दिया ने एक लम्बी सांस ली और चुपचाप अपने घर की तरफ
चली ।
“अरे छोटी
कहाँ गई थी इतनी सुबह सुबह ?”
भूमि की ओर देखते हुए दिया
ने कहा - “नहीं माँ, बस ऐसे ही टहलने
गई थी ।” देवेश की
निष्ठुरता, विश्वासघात और बेवफाई की बात कह कर लज्जित होने का साहस उसमें नहीं था ।
वह प्राय : सुबह को ऐसे ही टहलने जाया करती थी , बहुत दिनों बाद दिया को ऐसे देख माँ को लगा अब दिया सम्हलने की कोशिश कर रही है ।
वह पूरा दिन अपने घर के काम-धंन्धों में लगी रही । आज बहुत दिनों बाद रात का खाना वह
सबके साथ ही खाई । घर पर किसी ने अब तक दिया को कुछ नहीं कहा था क्योंकि उनसे भी बड़ा धोखा दिया को मिला था इस बात का एहसास उन्हें बखूब था ।
काफी दिनों बाद दिया के बदलते व्यवहार को देख उसकी माँ को आज चैन की नींद आई । दिया के चेहरे की सुकून को देख उसके भाइयों को भी
कुछ हद तक चैन मिला । और सभी लोग काफी दिनों बाद चैन से सोये ।
सुबह दिया के कमरे की बत्ती जलते देख
विजय की पत्नी जब उसके कमरे में गई तो दिया की लाश वहा पड़ी थी ।
आज भी ‘दहेज’ के आग में
सच्चे प्यार और किसी के इज्जत को निलाम करने वाले, सराफत का चोला ओढ़े खुद को सभ्य कहने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते । एक पढ़ी-लिखी लड़की और दहेज की लालसा रखे हुए देवेश की मनोवृत्ति दिया को पहले ही समझमें आजाता तो
दिया के घर से उसके साथ उसकी माँ की भी लाश नहीं निकलती । काश.....प्रेम के आढ़ में छुपे स्वार्थ को दिया वक्त रहते समझ पाती...। काश....।
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